मृत्युदंड और मानसिक स्वास्थ्य

भारतीय दंड संहिता में दी गई मौत की सज़ा की संविधानिक कानूनी वैधता को कई मामलों में चुनौती दी गई है और अब तक भारत के उच्चतम न्यायालय ने हमेशा यही माना है कि भारतीय दंड संहिता में दी गई मौत की सज़ा कानूनी तौर पर वैध है।

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अधिo सौम्या सिंह

6/4/20241 मिनट पढ़ें

मृत्युदंड वह सज़ा है जो न्यायालय हत्या जैसे गंभीर अपराध के दोषी व्यक्ति को मृत्यु के रूप में देता है। बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसकी संवैधानिकता को बरकरार रखा, किंतु कहा कि यह सज़ा केवल "विरल से विरलतम" (rarest of rare) मामलों में ही दी जा सकती है। मच्छी सिंह बनाम पंजाब राज्य (1983) में न्यायालय ने सज़ा सुनाने वाली अदालतों के लिए दो प्रश्न तय किए: पहला, क्या अपराध में कुछ असाधारण है जिसके कारण आजीवन कारावास अपर्याप्त हो जाता है; और दूसरा, क्या परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि अपराधी के पक्ष में मौजूद शमनकारी परिस्थितियों को पूरा महत्व देने के बाद भी मृत्युदंड के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

इस दूसरे प्रश्न में मानसिक स्वास्थ्य की केंद्रीय भूमिका है। राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्रोजेक्ट 39A ने NIMHANS, बेंगलुरु के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में Deathworthy: A Mental Health Perspective of the Death Penalty (2021) नामक अध्ययन किया। इसमें 88 मृत्युदंड प्राप्त कैदियों और उनके परिवारों से बात की गई। अध्ययन ने दो बातों की पड़ताल की: हिंसा के पीछे उनके जीवन का इतिहास क्या रहा, और मृत्युदंड की कोठरी (डेथ रो) में रहने का उनके मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है।

इसके निष्कर्ष चिंताजनक हैं। 88 कैदियों में से 46 बचपन में शारीरिक या मौखिक दुर्व्यवहार के शिकार हुए थे, 64 को उपेक्षा झेलनी पड़ी थी, और 73 अशांत पारिवारिक वातावरण में पले-बढ़े थे। जाँचे गए कैदियों में से 62.2 प्रतिशत को कम से कम एक मानसिक रोग था और 11 प्रतिशत में बौद्धिक अक्षमता पाई गई। रिपोर्ट में डेथ रो की परिस्थितियों और ख़राब मानसिक स्वास्थ्य के बीच संबंध भी पाया गया।

ये निष्कर्ष हिंसक अपराध को उचित नहीं ठहराते, और न ही यह सिद्ध करते हैं कि मानसिक रोग अपराध का कारण है। वे यह अवश्य दिखाते हैं कि जीवन और मृत्यु का फ़ैसला करने वाली अदालतों के सामने अक्सर ऐसे लोग होते हैं जिनका जीवन गंभीर बचपन की पीड़ा और अनुपचारित बीमारी से आकार पा चुका होता है। चूँकि बचन सिंह के अनुसार शमनकारी परिस्थितियों को तौलना आवश्यक है, इसलिए इस साक्ष्य पर सज़ा के चरण में ही व्यवस्थित रूप से विचार होना चाहिए, केवल दया याचिकाओं के चरण में नहीं।

न्यायालयों ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं। शत्रुघ्न चौहान बनाम भारत संघ (2014) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मानसिक रोग मृत्युदंड को आजीवन कारावास में बदलने का आधार हो सकता है। मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य (2022) में न्यायालय ने सज़ा तय करने से पहले शमनकारी सामग्री, जैसे मनोरोग मूल्यांकन, जेल में आचरण और सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, एकत्र करने पर बल दिया। इसी प्रकार, भारत के विधि आयोग ने अपनी 262वीं रिपोर्ट (2015) में आतंकवाद से जुड़े अपराधों को छोड़कर अन्य सभी अपराधों में मृत्युदंड समाप्त करने की सिफ़ारिश की थी।

इसलिए एक न्यायसंगत व्यवस्था को किसी का जीवन लेने से पहले पूरे व्यक्ति को देखना चाहिए। समाज की भी भूमिका है: अभावग्रस्त और हिंसक घरों में रह रहे बच्चों के लिए बाल-संरक्षण और मानसिक स्वास्थ्य सेवाएँ शुरुआती उम्र में उपलब्ध कराई जाएँ, तो मामला अदालत तक पहुँचने से बहुत पहले ही नुक़सान कम किया जा सकता है।

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